Saturday, 13 February 2016

सरस्वती पूजा

याद है वो बचपन, इन्ही नन्हें हाथो से हमने वो फूल की एक-एक लड़ियाँ लगाते थे| वो मंडप सजाना,पंडाल लगवाना, वो हर एक तैयारी करना, बात बात पे झगड़ा करना- भैया आप एक भी काम ढंग से नहीं करते ! और करते भी क्यों न आखिरकार साल भर में एक ही तो मौका मिलता था खुद के स्कूल, कोचिंग या हॉस्टल को नंबर one साबित करने का | आज भी वो पल याद है जब हम अपनी तोतली आवाज़ में प्रार्थना भी ऐसे गाते थे जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही हो- इतनी शक्ति हमें देना दाता.... मन का विश्वास कमजोर हो ना हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूलकर भी कोई भूल हो ना |हमसब भी बड़ी सुर में उन लड़कियों के साथ गाते- हे शारदे माँ !हे शारदे माँ!  अज्ञानता से हमें तार दे माँ |  विसर्जन की शाम तो सबको याद होगी,उसके मोह से भला कौन बच पाया है हम इतनी तैयारियों के बाद अंत में नाच गाने के साथ माँ को विदा करते थे, इसी उम्मीद में अगले साल जीवन फिर  इंद्रधनुषी रंगों से भर जाएगा | सब बच्चे एक कॉपी,किताब या कलम पूजा के वक्त माँ के चरणों में रखते थे, मैं अपनी माँ से पूछता माँ क्या सच में उस कलम से लिखने पर मैं टॉप करूँगा, माँ मेरे नादान सवालों पर बस मुस्कुरा कर रह जाती पर जो उनकी आँखों में दिखाई देता वो होता विश्वास | एक माँ का उस माँ के प्रति विश्वास जिसके हम सब बच्चे हैं | वो विश्वास ही तो है जो ज़िन्दगी के हर मोड़ पे मेरा साथ देता रहा है, चाहे मेरी माँ का हो या मेरी शारदे माँ का | तब उन चीज़ो के मायने अलग थे अब शायद ज़िंदगी के मायने बदल गए है, अगर कुछ नहीं बदला तो वो मेरा मन, मेरा मन जो आज भी खुद को उस बचपन में ढूंढ़ता है | इस दौड़-भाग या यूं कहे कि आधुनिकता के चक्कर में हमारी संस्कृति कहीं खो सी रही है,मानो लगता है वो बचपन अब इन कम्प्यूटरों, मोबाइल्स और तकनीक में कहीं खो सा गया है | आज भी मैं पूरी आत्मविश्वास से कह सकता हूँ वो कोई भी विद्यार्थी रहा हो, किसी भी धर्म का रहा हो लेकिन अगर वो कभी भी इस पूजा का साक्षी रहा होगा तो जरूर कहेगा, इससे खूबसूरत बचपन और कुछ नहीं हो सकता...........

या देवी सर्वभुतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
#सरस्वती पूजा


Monday, 8 February 2016

आज ज़रा फुरसत पायी थी, आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आखिरी घर को खोल के फिर आबाद किया - निदा फ़ाज़ली
#RIP

Thursday, 14 January 2016

वो हमारी आँखे भी मांगते तो हम दे देते
पर वो तो इन आँखों के ख्वाब मांगते रहे

Saturday, 14 November 2015

सीख

कभी कभी वो परमेश्वर भी अपने होने का एहसास दिलाता है और बतलाता है कि वो हमसे कितना प्यार करता है,कितनी फ़िक्र करता है हमारी
इसी बात पे वसीम बरेलवी साहब का शेर याद आता है....
खुली छतों के दीये कब के बुझ गए होते
पर कोई तो है जो आँधियों के पर कतरता हैं
-वसीम बरेलवी

Paris Attacks

मजहब की किताबों का हवाला मत दे ऐ हैवान 
जिहाद शब्द तो उसमें कहीं पढ़ाया ही नहीं जाता 

#Paris_Attacks

Sunday, 4 October 2015

सन्देश

गर जो तू दोस्त है,तो दोस्ती क्यों नहीं निभाता है
गर फ़िक्र होती  है तुझे मेरी,तो क्यों नहीं जताता है
गर वादा करता है मुझसे,तो निभाने से क्यों डरता है
गर तू मीत है मेरा,मेरी हर बात क्यों ठुकराता है
गर विश्वास है मुझपे,तो भी बतलाने से क्यों कतराता है
गर ये बस ज़िद है तेरी,तो क्यों इतनी खुदगर्जी दिखलाता है
ऐ दोस्त बता तू जब जरुरत होती है तेरी
तो तू कहाँ चला जाता है
तू कहाँ चला जाता है ...........तू कहाँ चला जाता है .....

Sunday, 23 August 2015

आज़ादी इन दीवारों से


  1. मैं कोई शायर या कवि नहीं हाँ बस अभी डिस्चार्ज मोबाइल और लम्बे रस्ते ने और कोई रास्ता ही न छोड़ा |इन सब ने मजबूर नहीं किया लिखने को वो तो बस इस सफर में एक हसीन छाप छोड़ने का जी चाह रहा हैहाँ इसमें को भी कोई दो मत नहीं शायद ये एक सयोंग है जहाँ ये सब मेरी इच्छाओ के पूरक बनते दिख रहे है | स्ट्रीट लाइट की हलकी रौशनी और हिचकोले खाती टैक्सी में लिखना वाकई मुश्किल है,पर पता नहीं क्यों ये मौसम भी आज साथ दे रहा है |बेकार लगता है जब ये शीशे की दीवार आ जाती है मेरे और इन ठंडी खूबसूरत हवाओं के बीच में ये ऐसी का ढकोसला भी न हवा की छुअन से दूर कर कर रहा है मुझको हवा का झोंका जब चेहरे को छूता हुआ निकलता है तो लगता है मानो महबूबा का दुपट्टा चेहरे को छूता निकल गया हों | पर ये मुहब्बत्त के दुश्मन उबेर और ओला ने भी न हमें AC के जाल में कैद करने का उपाय ढूंढ लिया है क्या जरुरत है इस दीवार की जब बाहर जहान इतना खूबसरत और मौसम बेईमान हो रहा हैआखिर क्यों कोई बंद रहे इस कैद में जब बाहर बारिश की वो हलकी बुँदे पुकार रही हो मिलने कोये कोई सवाल नही है ये तो मन में उठती उन उम्मीदों का आइना है,जिसमे हम इस जिंदगी से कुछ हसीं के पल तलाश रहे है ऐसा नहीं है की मैं उनलोगो से सवाल कर रहा हूँ जो इस आराम के आदी हो या किसी को झुलसती गर्मी में तपने की सलाह दे रहा हूँमैं तो बस इसी भावना उजागर करने की कोशिश कर रहा हूँ कही एक दिन ऐसा वक़्त ना आये ज़िन्दगी में किहम इन ढकोसलों के बीच असली ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाना भूल जाए,हम भूल जाए कि इस शीशे कि दिवार के उस पार भी एक दुनिया है और वो दुनिया-२ इतनी हसीन और खूबसूरत है कि जो उसमे जाता है बस कही खो सा जाता है,बस उसका हो जाता है मैं आपको उस शीशे को तोड़ने नहीं कह रहा हूँ मई तो बस कह रहा हूँ कि ये मन के भीतर जो शीशे कि दीवार है उसको तोडिये उसको तोडिये और जीना सीखिये ताकि कल जब थोड़ा वक़्त बचा हो अपने हिस्से में तब आपका मन आपसे कोई सवाल ना पूछे मैंने सोच लिया मैंने सोच लिया और गिरा दिया है मैने शीशा आज,तोड़ दी है दीवार ,बस तोड़ दी है दीवार |